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Dr. Yogesh Vyas

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ज्योतिषीय द्वादश भाव और उपाय-

चन्द्र ग्रह:-
मन का कारक ग्रह चन्द्रमा है , मन की स्थिति इसके द्वारा नियंत्रित होती है । इसकी वृश्चिक नीच राशी, वृष उच्च राशी और कर्क स्वराशी है । माता का विचार भी चन्द्र से किया जाता है, चन्द्रमा मातृ कारक है लेकिन माता का होना न होना और माता का स्वास्थ्य मंगल पर निर्भर है । कुंडली में यदि चन्द्रमा पीङित हो तो व्यक्ति को मानसिक बीमार बना देता है । चन्द्र प्रधान व्यक्ति अस्थिर मनोवृति के होते है ,जो कल्पना में निमग्न रहते है , भविष्य की सुन्दर योजनाओं का खाका खींचते है। लग्न में चन्द्रमा हो और अन्य ग्रह की कुदृष्टि या प्रभाव नही हो तो मनुष्य अत्यंत रूपवान होता है । चन्द्रमा की धनभाव में स्थिति अनेक उपक्रमों धनागमन की सूचक है लेकिन ऎसे लोगो के पास धन रूकता नही है । जो लोग सनकी प्रवृति के होते है वो बिगङे हुए चन्द्रमा का परिणाम है । कुंडली में सही स्थान पर चन्द्र बुध, चन्द्र गुरू या चन्द्र मंगल का योग हो तो अलग अलग क्षेत्रों में सुख समृद्धि देते है। इनमें चन्द्र मंगल का योग सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है ।

सूर्य ग्रह:-
ज्योतिष में सर्वाधिक शक्तिशाली ग्रह सूर्य है । मेष राशि में सूर्य उच्च का हो जाता है ! सूर्य का रत्न माणक है ! सूर्य बुध के योग से जो बुधादित्य योग की सृष्टि होती है उसे राजयोग माना जाता है ! नवें भाव एवम् पिता का कारक सूर्य कुंडली बिगङा हो तो इन दोनो भावों को बिगiङ डालता है । मंगल और सूर्य प्रधान व्यक्ति दोनों गुस्सेल प्रकृति के होते है लेकिन सूर्य प्रधान व्यक्ति को निरीह को सताते देखकर गुस्सा आता है । सूर्य के बिगङने की स्थिति में मोटापा और ह्रदय रोग और रक्तचाप की शिकायत होती है । पिता के साथ संबंध सूर्य की स्थिति पर निर्भर करते है । नीच का या विपरीत सूर्य जीवन को कभी एक स्तर ऊपर नही उठने देता । सूर्य शनि से बिगङता है , दोनों की एक दूसरे पर गलत स्थानों से दृष्टि हो तो जीवन बिगङता है । शनि के अंतर सूर्य या सूर्य के अन्तर्गत शनि की अन्तर्दशा परेशानी पैदा करती है! उच्च या नीच के ग्रह का रत्न नही पहनना चाहिए. रत्न को वजन के अनुसार नही बल्कि ग्रह के अंशानुसार पहना जाना चाहिए ।

बुध ग्रह:-
बुध- बुद्धि और वाणी का स्वामी है, रंग हरा है ।ज्योतिष का छोटा और सबसे ज्यादा अपने आप में ताकत समेटे हुए ग्रह बुध है । बुध का जितना महत्व 1-2-5-9-10 स्थान में है उतना कही नही । बुध के प्रभाव वाला व्यक्ति हंसने बोलने वाला,नसों से पूर्ण शरीर , हास्य में रुचि , बातुनी और तर्क वितर्क में पुष्ट होगा । ज्योतिष, चिकित्सा शास्त्र , लेखन , व्यापार का कारक ग्रह बुध है । चिकित्सा मंगल का क्षेत्र है लेकिन चिकित्सा का अध्ययन बुध के अंतर्गत आता है! बुध यदि नीच का भी हो तो सफलता दायी होता है क्योकि इसकी पूर्ण दृष्टि कन्या राशि पर होती है! बुद्धिजीवी व्यक्ति बुध की देन है लेकिन उसकी बुद्धि का स्तर गुरू पर भी निर्भर है! ऎसे बहुत से लोगो होते है जो बेहद बुद्धिमान होते है लेकिन बुद्धि का प्रयोग गलत कार्यों में करते है तो इसका कारण बिगङा हुआ बुध ही है । बुध कुंभ राशि में वक्तृत्व शक्ति में बहुत कमी कर देता है लेकिन शोध करने की क्षमता वहाँ ज्यादा देता है ।कन्या का बुध हो , अच्छी जगह हो तो अपने समान व्यापारिक गुण देता है । बुध अस्त होने के बावजूद फल देता है । बुध मंगल के साथ ठीक नही रहता है ।

गुरू ग्रह:-
गुरू सबसे सौम्य ग्रह जो मंगल , सूर्य का मित्र है।1-2-5-9-10-11 स्थानों में इसका विशेष महत्व है । 6-8-12 मे ये निष्फल है ।आज के समय में आपके जीवन में कोई स्नेही बुजुर्ग है तो आपकी कुंडली में गुरू बेहतर स्थिति में है, आपके अपने दादा दादी के साथ संबंध ठीक नही तो आपकी कुंडली में गुरू खराब है । लग्न में गुरू हो तो कुंडली के हजार दोष दूर करता है । गुरू यदि नीच स्थिति में भी लग्न में बैठा हो तो भले ही पैसा न दे लेकिन व्यक्ति को चमत्कारिक फकीर बना देता है । गुरू और शनि हालांकि शत्रु है! यदि कुंडली में सूर्य चन्द्रमा का षडाष्टक योग हो और गुरू शक्तिशाली स्थिति में हो तो कुंडली महत्वहीन हो जाती है । इसका मंगल से योग हो तो संतान अल्पायु होती है । वक्री गुरू संतान के लिए ठीक नही है , कन्या संतान अधिक देता है । सब योगों में गुरू चन्द्र का योग बहुत लाभदायक है । कुंडली में यदि गुरू सार्थक हो तो पुखराज अवश्य पहनना चाहिए ।

शुक्र ग्रह:-
शुक्र कन्या में नीच और मीन में उच्च का होता है ।उत्तम शुक्र कुंडली में हो तो व्यक्ति को कला की बुलंदियों तक पहुंचा देता हैफिल्मी दुनिया की चकाचौंध , फेशनेबल वस्त्र,विपरीत लिंगियों की ओर आकर्षण,ये संसार , ये सारी चीजें शुक्र के प्रतिनिधित्व में आती है शुक्र स्त्री ग्रह है । वीर्य, विवाह, काम भावना, सुख, आभूषण राजभोग और स्त्री अर्थात सप्तम भाव का कारक है लेकिन सप्तम भाव में अनिष्ट करता है । छठे, आठवें , बारहवें भाव में निष्फल है लेकिन कुछ लग्नों में बारहवें भाव में हो तो आश्चर्यजनक सफलता देता है । कर्क या वृश्चिक में शुक्र हो और किसी अन्य ग्रह का सहारा न हो तो अतिकामी बना देता है । समलैंगिक संबंधों में रूचि रखने वालों की कुंडली में आपको मंगल शुक्र का योग भी देखने को मिलेगी । बुध शुक्र या गुरू शुक्र की का तारतम्य बने तो राजयोग की सृष्टि होती है ।! कुंडली में शुक्र अच्छा है , व्यक्ति कपङों के चयन में सिद्धहस्त है , स्वच्छ और सुन्दर रहना चाहता है लेकिन यदि अन्य ग्रहों का साथ नही तो बिना अच्छी आर्थिक स्थिति के अच्छा शुक्र भी घुटन पैदा कर देता है । सूर्य का योग भी महत्वपूर्ण है लेकिन ये सूर्य से आगे हो तब । शुक्र वक्री हो तो लाभ देते है । शुक्र के शनि परम मित्र है । शुक्र के रत्न ओपल, हीरा है , जिनकी कुंडली में शुक्र किसी भी अच्छे भाव का अधिपति होकर सामान्य अवस्था में हो तो हीरा ,ऒपल धारण करना चाहिए ।

शनि ग्रह:- शनि को कर्मों के अनुसार पाप पुण्य का लेखा जोखा करने वाला ग्रह मानता है मेष राशि में ये नीच होते हैं जबकि तुला राशि में उच्च.शनिदेव शनिवार के अधिकारी होते हैं! अलग अलग खाने में स्थित होकर शनि शुभ और मंदा फल देता है! शनि शुभ होने पर मशीनरी, कारखाना, चमड़ा, सीमेंट, लोहा, तेल, ट्रांसपोर्ट के काम में व्यक्ति सफल होता है और धनवान बनता है.शनि कमज़ोर होने पर व्यक्ति पेट सम्बन्धी रोग से पीड़ित होता है! शनि को मंद गति से चलने वाला क्रूर ग्रह माना जाता है. शनि नीच कर्म का और परिश्रम का स्वामी है! .विचारों में गंभीरता, चालाकी, आलस्य, ध्यान, दु:ख, मृत्यु, सावधानी विषयों का अधिपति शनि होता है.! ज्योतिष की परम्परा में कर्म भाव से पिता एवं उनसे मिलने वाली सम्पत्ति का भी विचार किया जाता है.शनि देव कर्म के अधिपति होने से इस घर के अधिकारी है! दूसरे, तीसरे, सातवें और बारहवें खाने में शनि श्रेष्ठ होते हैं.शनि का मंदा घर एक, चार, पांच एवं छठा होता है.बुध, शुक्र एवं राहु के साथ शनि मित्रवत व्यवहार करते हैं.इनकी सूर्य, चन्द्र एवं मंगल से शत्रुता रहती है.केतु एवं बृहस्पति के साथ शनि समभाव रखते हैं! ! शनि नेत्र की ज्योति का स्वामी है.यह अन्य ग्रहों द्वारा मिलने वाले फलों पर दृष्टि रखता है.आचरण की अशुद्धता एवं तामसी भोजन से शनि पीड़ित होकर मंदा फल देते हैं! दृष्टि, सिर के बाल, कनपटी, भौंहें एवं रक्त वाहिनी नाड़ियां शरीर में शनि से प्रभावित होती है! शनि प्रभावित व्यक्ति में तमोगुण की अधिकता रहती है.शनि मंदा होने पर व्यक्ति क्रोधी होता है एवं क्रूरता व अज्ञान जनित कार्य करने से अपमानित होकर कष्ट प्राप्त करता है! शनि प्रभावित व्यक्ति अपने धुन के पक्के होते हैं.किसी से शत्रुता होने पर उससे बदला लिये बिना चैन से नहीं बैठते! केतु जब शनि के घर से एक घर पहले होता है तो शनि नीच फल देता है.शनि सूर्य से पहले घर में रहता है तो शनि का शुभ फल प्राप्त होता है.शुक्र और शनि के बीच दृष्टि सम्बन्ध होने पर स्त्री को कष्ट होता है एवं आर्थिक नुकसान भी सहना होता है.चन्द्र और शनि जब एक दूसरे को देखते हैं तब नेत्र रोग की संभावना प्रबल होती है.राहु और केतु से सम्बन्ध होने पर शनि पापी होता है! राहु के बाद शनि और उसके बाद के खाने में केतु होने पर शनि मंदा हो जाता है.बृहस्पति के घर में शनि शुभ फल देता है.
शनि के उपाय- उसके अनुसार कारोबार में लाभ हेतु काला सुरमा ज़मीन में दबाना चाहिए.रोटी में सरसों तेल लगाकर कुत्ते को देना चाहिए. शनिवार के दिन पात्र सहित सरसों तेल दान करना चाहिए.शनि की वस्तु जैसे उड़द, तिल, लोहा, चमड़े का सामान दान दें अथवा जल प्रवाहित करना चाहिए.आचारण को शुद्ध रखना चाहिए एवं मांस मदिरा से परहेज रखना चाहिए!

राहु- केतु:-
राहु केतु को अब छाया ग्रह माना जाने लगा है । कालसर्प दोष की सृष्टि राहु और केतु के बीच सभी ग्रहों के आ जाने से बनती है । कालसर्प एक भयंकर दोष कुंडली में होता है! कालसर्प दोष से ग्रहों की दृष्टियाँ अवरूद्ध हो जाती है । परिणामस्वरूप प्रतिभासंपन्न व्यक्ति भी सफलता हेतु छटपटाता रह जाता है । कालसर्प दोष भोग रहे लोगों को खराब राहु जहाँ मानसिक कष्ट देता है वही केतु शारीरिक पीङा देता है । राहु ग्यारहवे भाव में ठीक रहता है । यदि चौथे भाव मे राहु हो और चतुर्थेश अष्टमस्थ हो तो माता को कष्टदायी होता है । राहु भयंकर रूप से तब परेशानी देता है जब गुरू की महादशा में अन्तर्दशा के तौर पर गुजर रहा हो , ये किसी भी ग्रह के बीच गुजर रहे ग्रह की सबसे बुरी स्थिति है । हानि, पतन और हर निर्णय गलत । मिर्गी , ह्रदय रोग , चिङचिङापन राहु की देन है आपके नाखून बढे हुए रहने लगे ये खराब राहु का प्रमाण है ।। केतु खराब हो तो शरीर के अंग गलना, मवाद पङना जैसी पीङा देता है, विशेषतः वहाँ जहाँ मंगल देख रहे हो । जहाँ राहु एकादश भाव मे अच्छा है वही केतु वहाँ हो तो संभावित लाभ को शुन्य कर देता है!

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